अध्याय 484

वायलेट

मेरे सामने का नज़ारा मुझे बिल्कुल गूँगा कर गया।

मैं इस दरवाज़े के उस पार क्या मिलेगा, इसे लेकर ढेरों उम्मीदें साथ लायी थी—और मन के किसी कोने में एक दबा हुआ डर भी, क्योंकि पिछली बार जब मैंने इसे देखा था, यह लगभग तबाह हो चुका था।

अभी कुछ ही पल पहले तक मेरे खयाल माँ-बाप में इतने उलझे थे ...

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